टूटे हुए टुकड़े
धूल भरी आंधी में
आज मेरी मंज़िल भी अड़ सी गयी है
रोक रखा है इस धूमिल हवा ने
मेरा भी इरादा आज रुकने का नहीं
लग रहा हो जैसे ये भी अड़ गयी है
मुझे ही रोकना इसका इरादा बन गया
दोस्तों का साथ नहीं अब
काफी वक़्त जो हो गया कॉलेज से निकले
मिलते है कभी साल में
उन पुरानी यादों और बातों में
मेरी नींद ही तो है जो आज भी वैसी ही है
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